रणनीतिक सब्र: अमेरिका-इज़रायल से रिश्तों के बावजूद ईरान भारत को अपने करीब क्यों रखता है?
रणनीतिक सब्र: अमेरिका-इज़रायल से रिश्तों के बावजूद ईरान भारत को अपने करीब क्यों रखता है?
रणनीतिक सब्र: पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति के बीच ईरान और भारत के रिश्ते क्यों मजबूत बने हुए हैं? जानिए ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार बंदरगाह और रणनीतिक संतुलन के जरिए दोनों देशों की कूटनीति का पूरा विश्लेषण।
अमित कौल | डिजिटल डेस्क के लिए | बेंगलुरु | 11 मार्च, 2026 – पश्चिम एशिया की जटिल भू-राजनीति में भारत और ईरान के रिश्ते लंबे समय से रणनीतिक संतुलन और धैर्यपूर्ण कूटनीति का उदाहरण रहे हैं। एक ओर भारत के अमेरिका और इज़रायल के साथ मजबूत रक्षा और रणनीतिक संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ भी नई दिल्ली ने संवाद और सहयोग बनाए रखा है।
हालिया घटनाक्रमों में यह रिश्ता फिर चर्चा में आया जब भारत के विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने अपने ईरानी समकक्ष सैयद अब्बास अराघची से फोन पर बातचीत की। इस बातचीत में दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय हालात, बढ़ते तनाव और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाए रखने पर चर्चा की।
यह बातचीत पश्चिम एशिया संकट के बाद दोनों देशों के बीच तीसरी कूटनीतिक वार्ता थी, जो इस बात का संकेत देती है कि बढ़ते वैश्विक तनाव के बावजूद भारत और ईरान संवाद बनाए रखने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
रणनीतिक सब्र: पश्चिम एशिया संकट और नई कूटनीतिक चुनौती
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया की स्थिति काफी तनावपूर्ण रही है। अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। इस बीच ईरान के नेतृत्व में भी बड़ा बदलाव आया, जब देश के नए सर्वोच्च नेता के रूप में मोजतबा खामेनेई को जिम्मेदारी दी गई।
ऐसे संवेदनशील समय में भारत ने संतुलित और सावधानीपूर्ण कूटनीति अपनाई है। नई दिल्ली ने किसी भी पक्ष का खुला समर्थन करने के बजाय संवाद और स्थिरता की जरूरत पर जोर दिया है।
ईरान ने भी भारत के प्रति अपने बयान में संयम दिखाया और किसी प्रकार की सार्वजनिक आलोचना से बचते हुए द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाए रखने की बात कही।
चाबहार बंदरगाह: रणनीतिक साझेदारी की धुरी
भारत-ईरान संबंधों में सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से एक है चाबहार बंदरगाह।
यह बंदरगाह केवल एक व्यापारिक परियोजना नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधा समुद्री मार्ग मिलता है, जिससे पाकिस्तान पर निर्भरता कम होती है।
ईरान के लिए भी चाबहार एक ऐसा प्रवेश द्वार है जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद उसे वैश्विक व्यापार से जोड़ने की क्षमता रखता है।
हालांकि अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण भारत ने इस परियोजना में निवेश की गति कुछ समय के लिए धीमी कर दी थी, लेकिन ईरान ने सार्वजनिक रूप से इस पर कठोर प्रतिक्रिया नहीं दी। यह भी इस बात का संकेत है कि तेहरान भारत के साथ रिश्तों को बनाए रखना चाहता है।
ऊर्जा सुरक्षा: भारत के लिए बड़ा कारण
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देशों में से एक है। ईरान लंबे समय तक भारत के लिए कच्चे तेल का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण भले ही भारत ने ईरान से तेल आयात कम कर दिया हो, लेकिन भविष्य में व्यापार की संभावनाएं अभी भी मौजूद हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि प्रतिबंधों में ढील मिलती है तो दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग फिर तेज हो सकता है।
ईरान के लिए भी भारत जैसे विशाल बाजार के साथ संबंध बनाए रखना आर्थिक रूप से फायदेमंद है।
प्रवासी भारतीय और क्षेत्रीय स्थिरता
पश्चिम एशिया में लगभग एक करोड़ भारतीय नागरिक काम करते हैं और वहीं रहते हैं। यह समुदाय भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे हर साल बड़ी मात्रा में धनराशि भारत भेजते हैं।
अगर इस क्षेत्र में कोई बड़ा सैन्य संघर्ष होता है तो इसका सीधा असर इन प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इसलिए भारत के लिए क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना बेहद जरूरी है।
रणनीतिक सब्र: गुटनिरपेक्ष कूटनीति की नीति
भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। नई दिल्ली किसी एक शक्ति-गुट के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश करती है।
इसी नीति के कारण भारत अमेरिका और इज़रायल के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाते हुए भी ईरान के साथ संवाद बनाए रखता है।
ईरान भी इस संतुलित नीति को समझता है और भारत को पश्चिम एशिया की राजनीति में एक महत्वपूर्ण और भरोसेमंद साझेदार के रूप में देखता है।
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निष्कर्ष
भारत और ईरान के संबंध केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं बल्कि रणनीतिक हितों पर आधारित दीर्घकालिक साझेदारी हैं। ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार बंदरगाह, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे कई कारक दोनों देशों को एक-दूसरे के करीब बनाए रखते हैं।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बावजूद यह संबंध इस बात का उदाहरण है कि वैश्विक राजनीति में संयम, संतुलन और संवाद किस तरह दीर्घकालिक साझेदारी को बनाए रख सकते हैं।
लेखक के बारे में:
अमित कौल वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल न्यूज़ विश्लेषक हैं। वे राष्ट्रीय राजनीति, संस्कृति और समसामयिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। वर्तमान में वह Vartaprabhat.com के लिए नियमित लेखन कर रहे हैं।
