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“भारत का इस्तेमाल करेंगे, फिर छोड़ देंगे?” — पूर्व पेंटागन विश्लेषक का बड़ा दावा, अमेरिका-भारत रिश्तों पर उठे सवाल

“भारत का इस्तेमाल करेंगे, फिर छोड़ देंगे?” — पूर्व पेंटागन विश्लेषक का बड़ा दावा, अमेरिका-भारत रिश्तों पर उठे सवाल

“भारत का इस्तेमाल करेंगे, फिर छोड़ देंगे?” — पूर्व पेंटागन विश्लेषक कैरेन क्वियात्कोव्स्की के बयान से US-India संबंधों की वास्तविकता पर बहस तेज। क्या अमेरिका भारत को सिर्फ रणनीतिक जरूरत के तौर पर देखता है? पढ़ें पूरा विश्लेषण।

अमित कौल  |  डिजिटल डेस्क के लिए | बेंगलुरु |अप्रैल, 2026 – अमेरिका और भारत के बीच पिछले एक दशक में संबंधों में तेजी से सुधार हुआ है। रक्षा, तकनीक, व्यापार और इंडो-पैसिफिक रणनीति जैसे कई क्षेत्रों में दोनों देशों की साझेदारी मजबूत होती दिखाई देती है। लेकिन हाल ही में पूर्व पेंटागन विश्लेषक कैरेन क्वियात्कोव्स्की के बयान ने इस रिश्ते की वास्तविकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका भारत को एक “रणनीतिक उपकरण” की तरह देखता है—जिसका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर किया जा सकता है और फिर परिस्थितियों के अनुसार उसे किनारे भी किया जा सकता है।

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“भारत का इस्तेमाल करेंगे, फिर छोड़ देंगे?” —  ‘रणनीतिक साझेदारी’ या ‘रणनीतिक उपयोग’?

कैरेन क्वियात्कोव्स्की का दावा है कि अमेरिका के लिए भारत का महत्व उसके विशाल बाजार, कुशल कार्यबल और तकनीकी क्षमता के कारण है। लेकिन यह संबंध पूरी तरह “मूल्यों पर आधारित साझेदारी” नहीं है, बल्कि “रणनीतिक जरूरत” पर टिका हुआ है।

उनके अनुसार, वॉशिंगटन भारत को एक “counterweight” यानी संतुलनकारी शक्ति के रूप में देखता है—खासतौर पर एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए।

इस नजरिए से देखा जाए तो भारत-अमेरिका संबंधों की मजबूती का एक बड़ा कारण साझा लोकतांत्रिक मूल्य नहीं, बल्कि साझा रणनीतिक हित हैं।

🌏 चीन फैक्टर: रिश्तों की असली धुरी

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन का बढ़ता प्रभाव अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे में भारत एक स्वाभाविक सहयोगी के रूप में उभरता है।

  1. QUAD (चतुर्भुज सुरक्षा संवाद)
  2. रक्षा समझौते
  3. टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर सहयोग

इन सभी पहलों का एक बड़ा उद्देश्य चीन को संतुलित करना है। क्वियात्कोव्स्की का मानना है कि अगर भविष्य में यह आवश्यकता कम हो जाती है, तो अमेरिका की प्राथमिकताएं भी बदल सकती हैं।

⚠️ ट्रंप प्रशासन और ‘मिसलीडिंग पार्टनर्स’

क्वियात्कोव्स्की ने यह भी दावा किया कि Donald Trump के प्रशासन के दौरान सहयोगी देशों को “गुमराह करने” का एक पैटर्न देखने को मिला।

हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रवृत्ति सिर्फ ट्रंप तक सीमित नहीं है। अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में लंबे समय से यह सोच रही है कि गठबंधन तभी तक महत्वपूर्ण हैं, जब तक वे राष्ट्रीय हितों को पूरा करते हैं।

💼 अमेरिकी नीति: ‘हित पहले, दोस्ती बाद में’

पूर्व विश्लेषक के अनुसार, अमेरिका की विदेश नीति का मूल सिद्धांत है—राष्ट्रीय हित सर्वोपरि।

अगर कोई साझेदारी आर्थिक और रणनीतिक लाभ देती है, तो उसे मजबूत किया जाता है
अगर नहीं, तो उसे धीरे-धीरे कमजोर कर दिया जाता है

इस संदर्भ में भारत को लेकर भी यही नीति लागू हो सकती है। यानी, अगर भविष्य में अमेरिका को लगे कि भारत उसके हितों के अनुरूप नहीं है, तो संबंधों में ठंडापन आ सकता है।

“भारत का इस्तेमाल करेंगे, फिर छोड़ देंगे?” —  भारत के लिए क्या संकेत?

इस बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि भारत को अपनी विदेश नीति कैसे तय करनी चाहिए?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को “मल्टी-अलाइनमेंट” की नीति पर चलते रहना चाहिए—

  1. अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी
  2. रूस के साथ रक्षा सहयोग
  3. ग्लोबल साउथ के साथ मजबूत संबंध

भारत को किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचना होगा।

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🔍 निष्कर्ष: संतुलन की कूटनीति ही रास्ता

कैरेन क्वियात्कोव्स्की का बयान भले ही विवादास्पद हो, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म देता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दोस्ती नहीं, बल्कि स्थायी हित होते हैं।

भारत के लिए यह समय है कि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए वैश्विक मंच पर संतुलित और व्यावहारिक कूटनीति अपनाए।

 

 

 

 

लेखक के बारे में

अमित कौल

अमित कौल वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल न्यूज़ विश्लेषक हैं। वे राष्ट्रीय राजनीति, संस्कृति और समसामयिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। वर्तमान में वह Vartaprabhat.com के लिए नियमित लेखन कर रहे हैं।

 

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