बराक मिसाइलें, ड्रोन और घातक हथियार: क्या भारत इज़राइल पर जरूरत से ज़्यादा निर्भर होता जा रहा है?
बराक मिसाइलें, ड्रोन और घातक हथियार: क्या भारत इज़राइल पर जरूरत से ज़्यादा निर्भर होता जा रहा है?
बराक मिसाइलें, ड्रोन और घातक हथियार: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-इज़राइल रक्षा साझेदारी नई ऊंचाइयों पर है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत अब इज़राइली मिसाइल और ड्रोन तकनीक पर जरूरत से ज़्यादा निर्भर हो गया है?
अमित कौल | डिजिटल डेस्क के लिए | बेंगलुरु | 10 जनवरी 2026 – पिछले वर्ष पाकिस्तान के खिलाफ हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इज़राइल भारत के सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार के रूप में उभरा। इस सैन्य कार्रवाई में इज़राइली ड्रोन तकनीक ने निर्णायक भूमिका निभाई, खासकर जब पाकिस्तान के लाहौर स्थित HQ-9B एयर डिफेंस रडार सिस्टम को सफलतापूर्वक निष्क्रिय किया गया। इस घटना के बाद भारत-इज़राइल रक्षा सहयोग एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया।
बराक मिसाइलें: भारत और इज़राइल के बीच कई बड़े रक्षा सौदे
ड्रोन के अलावा, भारत और इज़राइल के बीच कई बड़े रक्षा सौदे पहले से ही लागू हैं या अंतिम चरण में हैं। इनमें बराक-8/MR-SAM एयर डिफेंस सिस्टम, SPICE प्रिसिजन-गाइडेड बम किट, एयर LORA स्टैंड-ऑफ मिसाइलें, डर्बी और I-डर्बी हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, स्पाइक एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें (ATGM) और विभिन्न UAV व लोइटरिंग म्यूनिशन प्लेटफॉर्म शामिल हैं। इसके साथ ही भारत भविष्य में आइस ब्रेकर मिसाइलें भी हासिल करने की तैयारी में है, जिन्हें पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम से रोकना बेहद कठिन माना जाता है।
हालांकि इस गहराते रक्षा सहयोग ने भारत की सैन्य क्षमताओं को मजबूती दी है, लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है—क्या भारत अब इज़राइल पर जरूरत से ज़्यादा निर्भर होता जा रहा है? रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि किसी एक विदेशी स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता दीर्घकालिक रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है।
भारत का इतिहास बताता है कि देश ने स्वदेशी मिसाइल विकास में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) के तहत अग्नि, पृथ्वी और आकाश जैसी मिसाइल प्रणालियां विकसित की गईं, जो आज भी भारतीय रक्षा तंत्र की रीढ़ हैं। इस कार्यक्रम का मूल उद्देश्य ही विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करना था। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत दो से ढाई साल के भीतर नई मिसाइल प्रणालियां विकसित करने की क्षमता रखता है, बशर्ते राजनीतिक इच्छाशक्ति और निरंतर निवेश बना रहे।
समस्या यह है कि जब भारत ने 2000 के दशक में इज़राइल से बराक एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा था, तब यह एक तात्कालिक ऑपरेशनल जरूरत को पूरा करने के लिए सही फैसला था। लेकिन अब जब यह सिस्टम अपने ऑपरेशनल जीवन के अंत की ओर बढ़ रहा है, तो उसी श्रेणी में कोई पूरी तरह स्वदेशी विकल्प उपलब्ध नहीं है। नतीजतन, भारतीय सेना को एक बार फिर विदेशी सतह-से-हवा में मार करने वाली मिसाइलों की तलाश करनी पड़ रही है।
विदेशी हथियारों की चुनौती
विदेशी हथियारों के साथ एक और बड़ी चुनौती री-स्टॉकिंग और सप्लाई चेन कंट्रोल की है। शुरुआती खरीद आमतौर पर सीमित मात्रा में होती है और लंबे संघर्ष की स्थिति में गोला-बारूद की भरपाई समय-साध्य और जटिल हो जाती है। इसके अलावा, इज़राइल जैसे देशों द्वारा सप्लाई चेन पर कड़ा नियंत्रण बनाए रखा जाता है, जिससे रणनीतिक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।
इन चिंताओं को कम करने के लिए इज़राइल ने भारत में लोकल प्रोडक्शन का प्रस्ताव जरूर दिया है, जो सतह पर ‘मेक इन इंडिया’ के अनुरूप दिखता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश मामलों में भारत को केवल असेंबली या कम लागत वाले कंपोनेंट्स तक ही सीमित रखा गया है। महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी, सॉफ्टवेयर और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स अब भी इज़राइली कंपनियों के नियंत्रण में हैं।
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एयर LORA, आइस ब्रेकर, SPICE, डर्बी, स्काईसेप्टर, स्पाइक ATGM और विभिन्न UAV प्लेटफॉर्म इसी मॉडल पर आधारित हैं। इससे भारतीय निजी कंपनियों को उत्पादन का अनुभव तो मिलता है, लेकिन सच्ची आत्मनिर्भरता का लक्ष्य अधूरा रह जाता है।
अंततः सवाल यही है कि क्या भारत को तत्काल सैन्य जरूरतों और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता के बीच बेहतर संतुलन नहीं बनाना चाहिए। इज़राइल एक महत्वपूर्ण और भरोसेमंद साझेदार है, लेकिन रक्षा क्षेत्र में अत्यधिक विदेशी निर्भरता भविष्य में रणनीतिक चुनौतियां खड़ी कर सकती है।
लेखक के बारे में:
अमित कौल वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल न्यूज़ विश्लेषक हैं। वे राष्ट्रीय राजनीति, संस्कृति और समसामयिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। वर्तमान में वह Vartaprabhat.com के लिए नियमित लेखन कर रहे हैं।
