लाल किला आतंकी जांच: सेब की फसल बनी आत्मघाती भर्ती योजना से पीछे हटने की वजह
लाल किला आतंकी जांच: सेब की फसल बनी आत्मघाती भर्ती योजना से पीछे हटने की वजह
लाल किला आतंकी जांच: लाल किले के पास हुए कार बम धमाके की जांच में बड़ा खुलासा। कैसे एक संभावित आत्मघाती हमलावर ने सेब की फसल के कारण आतंकी साजिश से खुद को अलग कर लिया।
अमित कौल | डिजिटल डेस्क के लिए | बेंगलुरु | 18 जनवरी 2026 – दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले के पास हाल ही में हुए कार बम धमाके की जांच में सुरक्षा एजेंसियों को आतंकी नेटवर्क के काम करने के तरीकों को लेकर अहम जानकारियां मिली हैं। इस हमले के बाद पकड़े गए तथाकथित “व्हाइट कॉलर” आतंकी मॉड्यूल की जांच में सामने आया है कि मास्टरमाइंड डॉ. उमर-उन-नबी ने एक दूसरे आत्मघाती हमलावर को भर्ती करने की कोशिश की थी, लेकिन यह योजना आख़िरी चरण में विफल हो गई।
अधिकारियों के अनुसार, संभावित आत्मघाती हमलावर ने सेब की फसल के मौसम और अपने परिवार की ज़रूरतों का हवाला देते हुए आतंकी साजिश से पीछे हटने का फैसला किया। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह घटना आतंकी भर्ती प्रक्रिया की जटिलताओं और उसमें शामिल मनोवैज्ञानिक पहलुओं को उजागर करती है।
व्हाइट कॉलर आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश
श्रीनगर पुलिस और नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) की संयुक्त जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि डॉ. उमर-उन-नबी केवल एक हमलावर नहीं, बल्कि एक संगठित भर्ती रणनीतिकार भी था। वही नबी 10 नवंबर को लाल किले के बाहर विस्फोटक से भरे वाहन को चला रहा था, जिसमें 12 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी।
जांच एजेंसियों के अनुसार, नबी एक समानांतर आतंकी नेटवर्क खड़ा कर रहा था, जिसमें स्वतंत्र और सेकेंडरी सेल बनाए जा रहे थे। इसका उद्देश्य यह था कि यदि एक सेल पकड़ा जाए, तो भी अन्य सेल सक्रिय रह सकें।
लाल किला आतंकी जांच: संभावित आत्मघाती हमलावर की पहचान
पूछताछ के बाद NIA ने शोपियां निवासी यासिर अहमद डार को गिरफ्तार किया है। अधिकारियों के मुताबिक, नबी ने डार को एक संभावित आत्मघाती हमलावर के रूप में कट्टरपंथी बनाने में काफी हद तक सफलता हासिल कर ली थी।
हालांकि, अगस्त 2025 में हुई एक बैठक के दौरान डार ने आख़िरी समय पर इस योजना से खुद को अलग कर लिया। उसने सेब की फसल के मौसम, परिवार की आर्थिक ज़रूरतों और घर की मरम्मत जैसे कारण बताए। जांच एजेंसियों का कहना है कि यह फैसला अचानक लिया गया, लेकिन इससे एक बड़े हमले की योजना पटरी से उतर गई।
डॉक्टर की पहचान और भर्ती की रणनीति
जांच में सामने आया है कि डॉ. उमर-उन-नबी की एक मेडिकल डॉक्टर के रूप में सामाजिक पहचान ने भर्ती प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई। डार ने स्वीकार किया कि नबी की पेशेवर स्थिति के कारण उसकी बातें ज़्यादा विश्वसनीय और प्रभावशाली लगती थीं।
अधिकारियों का कहना है कि यह मामला दिखाता है कि किस तरह पढ़े-लिखे और पेशेवर दिखने वाले लोग युवाओं को कट्टरपंथ की ओर धकेलने में सफल हो जाते हैं।
लाल किला आतंकी जांच: डिजिटल माध्यमों से संपर्क
पूछताछ में यह भी सामने आया कि डार और नबी के बीच संपर्क टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के ज़रिए होता था। डार को नियमित रूप से शारीरिक प्रशिक्षण पर ध्यान देने और “ऑपरेशन” के लिए खुद को तैयार रखने के निर्देश दिए जाते थे।
पुलिस ने एक आरोपी के फोन से एक वॉयस नोट भी बरामद किया है, जिसमें जिहाद के लिए ‘बायत’ यानी निष्ठा की शपथ ली जा रही है। इसे जांच एजेंसियां कट्टरपंथी नेटवर्क की गंभीरता के सबूत के तौर पर देख रही हैं।
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निष्कर्ष
लाल किला आतंकी जांच ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकी संगठन अब केवल हथियारों के दम पर नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक प्रभाव, सामाजिक पहचान और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के ज़रिए भर्ती की रणनीति पर काम कर रहे हैं। वहीं, सेब की फसल जैसे मानवीय और पारिवारिक कारणों का सामने आना यह भी दिखाता है कि हर कट्टरपंथीकरण अपरिवर्तनीय नहीं होता।
सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही हैं, ताकि भविष्य में ऐसी साजिशों को समय रहते नाकाम किया जा सके।
लेखक के बारे में:
अमित कौल वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल न्यूज़ विश्लेषक हैं। वे राष्ट्रीय राजनीति, संस्कृति और समसामयिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। वर्तमान में वह Vartaprabhat.com के लिए नियमित लेखन कर रहे हैं।
