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ईरान युद्ध में अमेरिका को बड़ा झटका? 40 दिन की बमबारी में 42 विमान नष्ट होने की कांग्रेसनल रिपोर्ट ने उठाए सवाल

ईरान युद्ध में अमेरिका को बड़ा झटका? 40 दिन की बमबारी में 42 विमान नष्ट होने की कांग्रेसनल रिपोर्ट ने उठाए सवाल

ईरान युद्ध में अमेरिका को बड़ा झटका: अमेरिकी कांग्रेसनल रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान के खिलाफ 40 दिन चले संयुक्त US-इज़राइल अभियान में अमेरिका ने 42 विमान खो दिए या उन्हें भारी नुकसान हुआ। जानिए “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” की पूरी कहानी, रणनीतिक असर और इसके वैश्विक परिणाम।

अमित कौल  |  डिजिटल डेस्क के लिए | बेंगलुरु | 19 मई, 2026 – ईरान के खिलाफ अमेरिका और इज़राइल द्वारा चलाए गए 40 दिन लंबे हवाई अभियान को लेकर सामने आई नई कांग्रेसनल रिपोर्ट ने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों और रणनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस अभियान के दौरान अमेरिका ने 42 विमान खो दिए या उन्हें गंभीर नुकसान पहुँचा। यह दावा केवल सैन्य नुकसान की कहानी नहीं कहता, बल्कि आधुनिक युद्ध की बदलती वास्तविकताओं और अमेरिकी सैन्य शक्ति की सीमाओं को भी उजागर करता है।

13 मई को जारी कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (CRS) की रिपोर्ट में “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” का विस्तृत आकलन प्रस्तुत किया गया है। यह ऑपरेशन 28 फरवरी को शुरू हुआ था, जब अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान के कई सामरिक ठिकानों पर समन्वित हवाई हमले किए। इसके बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ा और हालात पूर्ण युद्ध में बदल गए। हालांकि पिछले महीने एक कमजोर युद्धविराम समझौते के बाद फिलहाल लड़ाई रुकी हुई है, लेकिन इस संघर्ष के प्रभाव अब भी जारी हैं।

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रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू अमेरिकी विमानों का भारी नुकसान है। आमतौर पर अमेरिकी सेना को तकनीकी रूप से दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकत माना जाता है, लेकिन इस रिपोर्ट ने यह संकेत दिया है कि आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम और ड्रोन युद्ध ने पारंपरिक अमेरिकी बढ़त को चुनौती देना शुरू कर दिया है।

MQ-9A रीपर ड्रोन के बेड़े को सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ। रिपोर्ट्स बताती हैं कि 24 MQ-9A ड्रोन या तो नष्ट हो गए या लड़ाई के लिए पूरी तरह से बेकार हो गए। MQ-9A रीपर, जिसका इस्तेमाल सटीक हमलों, इंटेलिजेंस इकट्ठा करने और मॉनिटरिंग के लिए किया जाता है, अमेरिका का सबसे एडवांस्ड ड्रोन प्लेटफॉर्म माना जाता है। हालांकि, ये ड्रोन ईरान के बड़े एयर डिफेंस नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमताओं के सामने उम्मीद से ज़्यादा कमज़ोर निकले।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक MQ-9A ड्रोन की कीमत $56 मिलियन से ज़्यादा है। नतीजतन, अकेले ड्रोन से होने वाला नुकसान अरबों डॉलर तक पहुँच सकता है। इससे भविष्य की ड्रोन पॉलिसी और अमेरिकी रक्षा बजट पर भी शक होता है। ऐसे में केवल ड्रोन के नुकसान ही अरबों डॉलर की लागत तक पहुँच सकते हैं। इससे अमेरिकी रक्षा बजट और भविष्य की ड्रोन रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सात KC-135 स्ट्रैटोटैंकर विमान या तो नष्ट हुए या उन्हें भारी नुकसान पहुँचा। ये विमान हवा में लड़ाकू विमानों को ईंधन भरने का काम करते हैं और लंबी दूरी के अभियानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यदि टैंकर विमान असुरक्षित हो जाते हैं, तो अमेरिका की लंबी दूरी तक युद्ध लड़ने की क्षमता सीधे प्रभावित होती है।

सबसे गंभीर घटनाओं में से एक इराक के ऊपर हुई हवाई टक्कर थी, जिसमें अमेरिकी वायुसेना के छह जवान मारे गए। यह घटना दर्शाती है कि युद्ध केवल दुश्मन की गोलीबारी से ही नहीं बल्कि अत्यधिक दबाव और जटिल सैन्य अभियानों के कारण भी जानलेवा बन सकता है।

रिपोर्ट में F-15E स्ट्राइक ईगल, A-10C थंडरबोल्ट, F-35A स्टेल्थ फाइटर, E-3 सेंट्री AWACS और MC-130J जैसे महत्वपूर्ण विमानों के नुकसान का भी उल्लेख है। खासतौर पर E-3 AWACS विमान का नष्ट होना अमेरिकी सेना के लिए बड़ी चिंता माना जा रहा है। यह विमान हवाई चेतावनी और कमांड सेंटर की तरह काम करता है। इसकी संख्या पहले से सीमित है और तुरंत इसका विकल्प उपलब्ध नहीं है।

अमेरिका ने लंबे समय से इन एयरक्राफ्ट को “लगभग अजेय” टेक्नोलॉजी के तौर पर पेश किया है, इसलिए F-35A जैसे स्टेल्थ फाइटर का नुकसान ध्यान देने लायक है। ईरान जैसे देशों की अपने एयर डिफेंस सिस्टम से इन विमानों का मुकाबला करने की क्षमता दुनिया में शक्ति संतुलन में बदलाव का संकेत दे सकती है।

इस युद्ध ने एक और महत्वपूर्ण तथ्य उजागर किया है—ड्रोन और मिसाइल आधारित युद्ध का नया युग। ईरान ने वर्षों से अपने मिसाइल नेटवर्क, भूमिगत सैन्य ठिकानों और एयर डिफेंस सिस्टम पर निवेश किया है। रिपोर्ट के अनुसार, यही रणनीति अमेरिकी वायुशक्ति को सीमित करने में प्रभावी साबित हुई।

राजनीतिक स्तर पर भी यह रिपोर्ट अमेरिका के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती है। अमेरिकी प्रशासन अब तक इस अभियान को “रणनीतिक सफलता” बताता रहा था, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में विमानों के नुकसान की जानकारी सामने आने के बाद विपक्ष और रक्षा विशेषज्ञ सरकार से जवाब मांग सकते हैं। कांग्रेस में यह बहस तेज हो सकती है कि क्या अमेरिका को पश्चिम एशिया में इतने बड़े सैन्य अभियानों में सीधे शामिल होना चाहिए।

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इज़राइल के लिए भी यह संघर्ष पूरी तरह सकारात्मक नहीं रहा। हालांकि उसने ईरान के कई सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुँचाने का दावा किया, लेकिन लंबे युद्ध ने उसकी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था दोनों पर दबाव बढ़ाया। दूसरी ओर, ईरान ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह केवल रक्षात्मक शक्ति नहीं बल्कि तकनीकी और रणनीतिक रूप से भी मजबूत प्रतिद्वंद्वी बन चुका है।

कुल मिलाकर, “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” की यह रिपोर्ट आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप की गंभीर तस्वीर पेश करती है। अमेरिका जैसे सैन्य महाशक्ति को यदि 40 दिनों के अभियान में इतने बड़े नुकसान उठाने पड़े हैं, तो आने वाले वर्षों में वैश्विक युद्ध रणनीतियाँ पूरी तरह बदल सकती हैं। यह लड़ाई सिर्फ़ ईरान और अमेरिका के बीच टकराव से कहीं ज़्यादा थी; यह इस बात का संकेत बन गई है कि भविष्य में युद्ध कैसे होगा।

 

 

 

 

लेखक के बारे में

अमित कौल

अमित कौल वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल न्यूज़ विश्लेषक हैं। वे राष्ट्रीय राजनीति, संस्कृति और समसामयिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। वर्तमान में वह Vartaprabhat.com के लिए नियमित लेखन कर रहे हैं।

 

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