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‘मोदी स्वयंसेवक हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में स्वतंत्र’: मोहन भागवत ने आरएसएस और सरकार के रिश्तों पर दूर की कई गलतफहमियां

‘मोदी स्वयंसेवक हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में स्वतंत्र’: मोहन भागवत ने आरएसएस और सरकार के रिश्तों पर दूर की कई गलतफहमियां

 

‘मोदी स्वयंसेवक हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में स्वतंत्र’: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने संघ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रिश्तों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि मोदी स्वयंसेवक हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में संविधान के अनुसार स्वतंत्र निर्णय लेते हैं। जानिए संघ, राजनीति और सरकार के संबंधों पर भागवत का पूरा विश्लेषण।

 

‘मोदी स्वयंसेवक हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में स्वतंत्र’: मोहन भागवत ने आरएसएस और सरकार के रिश्तों पर क्या कहा?

अमित कौल  |  डिजिटल डेस्क के लिए | बेंगलुरु | 15 जून, 2026 – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस ) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक बार फिर संघ और राजनीतिक सत्ता के रिश्तों को लेकर चल रही बहस के बीच महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। ‘संघ यात्रा के 100 साल – नई राहें’ कार्यक्रम में भागवत ने न केवल संघ के बारे में फैली कई धारणाओं को चुनौती दी, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संघ के संबंधों को लेकर भी स्पष्ट संदेश दिया।

भागवत ने यह बात ऐसे समय में कही है जब राजनीतिक विशेषज्ञ और विपक्षी दल अक्सर केंद्र सरकार के RSS के साथ संबंधों पर सवाल उठाते रहे हैं। संघ को लेकर यह धारणा लंबे समय से मौजूद है कि वह भारतीय राजनीति, विशेषकर भाजपा सरकार के निर्णयों को प्रभावित करता है। हालांकि भागवत ने इस धारणा को सीधे तौर पर खारिज करने की कोशिश की।

संघ को दुनिया का सबसे गलत समझा जाने वाला संगठन बताया

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि आरएसएस दुनिया के सबसे अधिक गलत समझे जाने वाले संगठनों में से एक है। उनके अनुसार संघ के बारे में अनेक मिथक और भ्रम समाज में फैले हुए हैं, जिनका वास्तविकता से बहुत कम संबंध है।

भागवत ने कहा कि कई लोगों के मन में संघ को लेकर अनावश्यक भय पैदा कर दिया गया है। उन्हें लगता है कि यदि संघ का प्रभाव बढ़ता है तो उनकी पहचान, विचारधारा या सामाजिक प्रगति पर असर पड़ सकता है। उन्होंने इसे गलत प्रचार और वर्षों से चल रहे वैचारिक विरोध का परिणाम बताया।

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संघ प्रमुख का यह बयान केवल संगठन की छवि सुधारने का प्रयास नहीं था, बल्कि वह संघ की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश भी प्रतीत हुआ। उन्होंने यह संदेश देने का प्रयास किया कि संघ का उद्देश्य राजनीतिक सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज निर्माण है।

मोदी और संघ: विचारधारा का संबंध, सत्ता का नहीं?

मोहन भागवत के भाषण का सबसे चर्चित हिस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर दिया गया उनका वक्तव्य रहा। उन्होंने कहा कि लोग अक्सर आरएसएस को सीधे प्रधानमंत्री मोदी से जोड़कर देखते हैं। यह सच है कि मोदी संघ के स्वयंसेवक रहे हैं और उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि संघ से जुड़ी हुई है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रधानमंत्री के रूप में वे संघ के निर्देशों पर काम करते हैं।

भागवत ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री संविधान के तहत देश के निर्वाचित प्रमुख हैं और अपने संवैधानिक दायित्वों के अनुसार निर्णय लेते हैं। उन्होंने कहा कि विचारधारात्मक जुड़ाव और प्रशासनिक स्वतंत्रता दो अलग-अलग बातें हैं।

यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि विपक्ष लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि सरकार की कई नीतियां आरएसएस के एजेंडे से प्रभावित होती हैं। भागवत का संदेश इस धारणा को कमजोर करने का प्रयास माना जा सकता है।

‘मोदी स्वयंसेवक हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में स्वतंत्र’: संघ और राजनीति के रिश्ते को लेकर क्या है वास्तविकता?

आरएसएस स्वयं को एक सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन बताता है। हालांकि संघ से प्रेरित कई संगठन शिक्षा, श्रमिक, किसान, छात्र और राजनीतिक क्षेत्रों में सक्रिय हैं। भाजपा को भी व्यापक रूप से संघ की वैचारिक धारा से जुड़ा माना जाता है।

लेकिन भागवत ने अपने भाषण में यह रेखांकित किया कि संघ से जुड़े सभी संगठन स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल हों या अन्य संस्थाएं, वे अपने-अपने क्षेत्र में निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। संघ केवल रचनात्मक और सामाजिक कार्यों में सहयोग करता है।

यह दृष्टिकोण संघ के उस आधिकारिक रुख को दोहराता है जिसके अनुसार संगठन प्रत्यक्ष राजनीति में भाग नहीं लेता, बल्कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्र निर्माण की सोच को बढ़ावा देता है।

100 साल पूरे होने से पहले संघ की नई रणनीति?

आरएसएस अगले कुछ वर्षों में अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे करने जा रहा है। ऐसे समय में मोहन भागवत के बयान को संगठन की व्यापक रणनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि संघ अब अपनी सार्वजनिक छवि को अधिक समावेशी और संवादात्मक बनाने की कोशिश कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में संघ नेतृत्व ने विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और बौद्धिक समूहों के साथ संवाद बढ़ाने पर जोर दिया है।

भागवत का यह कहना कि संघ के बारे में लोगों के मन में बेवजह का डर है, दरअसल उसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है जिसमें संगठन अपने आलोचकों और विरोधियों तक भी अपनी बात पहुंचाने का प्रयास कर रहा है।

‘मोदी स्वयंसेवक हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में स्वतंत्र’: राजनीतिक संदेश और भविष्य के संकेत

मोहन भागवत का बयान केवल संघ की भूमिका स्पष्ट करने तक सीमित नहीं है। इसमें एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी छिपा दिखाई देता है। उन्होंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि संघ और सरकार के बीच वैचारिक समानता हो सकती है, लेकिन संस्थागत रूप से दोनों स्वतंत्र हैं।

आने वाले समय में जब देश की राजनीति, सामाजिक विमर्श और वैचारिक बहसें और तेज होंगी, तब आरएसएस की भूमिका को लेकर चर्चा भी जारी रहेगी। ऐसे में भागवत का यह बयान संघ की ओर से दिया गया एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण माना जा सकता है।

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संघ प्रमुख ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि आरएसएस को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय उसके सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों के आधार पर भी समझा जाना चाहिए। हालांकि यह बहस आगे भी जारी रहेगी कि विचारधारा और सत्ता के बीच वास्तविक दूरी कितनी है और निकटता कितनी।

 

 

 

 

 

 

लेखक के बारे में

अमित कौल

अमित कौल वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल न्यूज़ विश्लेषक हैं। वे राष्ट्रीय राजनीति, संस्कृति और समसामयिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। वर्तमान में वह Vartaprabhat.com के लिए नियमित लेखन कर रहे हैं।

 

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