एनआईए कोर्ट का बड़ा फैसला: आतंकी साज़िश मामले में तीन कश्मीरी छात्र दोषी, चौथा आरोपी बरी; पंजाब में ए.जी.एच. नेटवर्क पर न्यायिक मुहर
एनआईए कोर्ट का बड़ा फैसला: आतंकी साज़िश मामले में तीन कश्मीरी छात्र दोषी, चौथा आरोपी बरी; पंजाब में ए.जी.एच. नेटवर्क पर न्यायिक मुहर
एनआईए कोर्ट का बड़ा फैसला: मोहाली की विशेष एनआईए कोर्ट ने अंसार गज़वत-उल-हिंद (ए.जी.एच.) से जुड़े आतंकी साज़िश मामले में तीन कश्मीरी छात्रों को दोषी ठहराया है। जानिए इस फैसले का कानूनी, सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से क्या महत्व है।
एनआईए कोर्ट का बड़ा फैसला: आतंकी साज़िश मामले में तीन कश्मीरी छात्र दोषी, चौथा आरोपी बरी; पंजाब में AGH नेटवर्क पर न्यायिक मुहर
अमित कौल | डिजिटल डेस्क के लिए | बेंगलुरु | 5 जून, 2026 – राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े एक बड़े मामले में, मोहाली की एक विशेष NIA अदालत ने तीन कश्मीरी छात्रों को दोषी ठहराया है। इस मामले का संबंध एक कथित आतंकी साज़िश से था, जिसमें ‘अंसार ग़ज़वत-उल-हिंद’ (AGH) भी शामिल था। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में सफल रहा कि आरोपियों ने भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साज़िश के तहत हथियार, गोला-बारूद और विस्फोटक सामग्री जमा करने में भूमिका निभाई थी। वहीं, चौथे आरोपी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।
यह फैसला केवल एक आपराधिक मामले का निष्कर्ष नहीं है, बल्कि यह भारत की आतंकवाद-रोधी न्यायिक प्रक्रिया, डिजिटल सबूतों की स्वीकार्यता और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति अदालतों के दृष्टिकोण को भी रेखांकित करता है।
क्या है पूरा मामला?
मामले की जड़ें अक्टूबर 2018 में पंजाब के जालंधर स्थित CT इंस्टीट्यूट के एक हॉस्टल तक पहुंचती हैं। 10 अक्टूबर 2018 को पंजाब पुलिस द्वारा की गई छापेमारी के दौरान एक कमरे से AK-सीरीज राइफल, मैगज़ीन, जिंदा कारतूस, विस्फोटक सामग्री और अन्य आपत्तिजनक वस्तुएं बरामद हुई थीं।
जांच के दौरान पुलवामा के रहने वाले ज़ाहिद गुलज़ार और यासिर रफ़ीक़ भट उस कमरे में रहते हुए पाए गए। इसके बाद, जब यह तय हो गया कि यह मामला राष्ट्रीय हित से जुड़ा है, तो जांच NIA को सौंप दी गई।
लंबी जांच और सुनवाई के बाद विशेष एनआईए न्यायाधीश दिनेश कुमार वधवा ने ज़ाहिद गुलज़ार, यासिर रफ़ीक भट और मोहम्मद इदरीश शाह को दोषी ठहराया, जबकि सुहैल अहमद भट को बरी कर दिया।
एनआईए कोर्ट का बड़ा फैसला: ए.जी.एच. और ज़ाकिर मूसा कनेक्शन
एनआईए का दावा है कि यह पूरा नेटवर्क प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन ‘अंसार गजवत-उल-हिंद’ (ए.जी.एच.) से जुड़ा था, जिसकी स्थापना 2017 में ज़ाकिर राशिद भट (जिसे ज़ाकिर मूसा के नाम से भी जाना जाता है) ने की थी।
AGH बनाने के लिए अलग होने से पहले, ज़ाकिर मूसा हिज्बुल मुजाहिदीन का सदस्य था। जांच एजेंसियों का आरोप है कि संगठन पंजाब, जम्मू-कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों में आतंकी गतिविधियों के जरिए अस्थिरता फैलाने की योजना बना रहा था।
अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि आरोपियों को एन्क्रिप्टेड संचार माध्यमों के जरिए निर्देश दिए जाते थे और उन्होंने गुरदासपुर तथा अमृतसर के आसपास के इलाकों से हथियारों और विस्फोटकों का जखीरा एकत्र किया था।
डिजिटल सबूतों ने निभाई निर्णायक भूमिका
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता डिजिटल फोरेंसिक साक्ष्य रहे। जांच एजेंसियों ने मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से डेटा बरामद किया।
एनआईए के अनुसार इन उपकरणों में ज़ाकिर मूसा, बुरहान वानी और ए.जी.एच. से जुड़ी प्रचार सामग्री, तस्वीरें और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड मिले। अदालत ने यह भी माना कि ज़ाहिद गुलज़ार के मोबाइल फोन में उन स्थानों की तस्वीरें मौजूद थीं, जहां से कथित तौर पर विस्फोटक सामग्री प्राप्त की गई थी।
इस मामले से आतंकवाद विरोधी जांच में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सबूतों के महत्व पर प्रकाश डाला गया है, खासकर इस तथ्य के प्रकाश में कि आतंकवादी नेटवर्क अब संचार के अधिक पारंपरिक तरीकों के बजाय डिजिटल मीडिया और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रहे हैं।
एनआईए कोर्ट का बड़ा फैसला: अदालत ने किन धाराओं के तहत दोषी ठहराया?
तीनों दोषियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 121-A, 122 और 120-B के तहत दोषी ठहराया गया। ये धाराएं भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साज़िश, युद्ध के उद्देश्य से हथियार या संसाधन एकत्र करने तथा आपराधिक साज़िश से संबंधित हैं।
इसके अलावा उन्हें गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 18 और 20, शस्त्र अधिनियम की धारा 25 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 5 के तहत भी दोषी पाया गया।
इन धाराओं के तहत दोष सिद्ध होना दर्शाता है कि अदालत ने मामले को केवल हथियार रखने का मामला नहीं माना, बल्कि इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकी साज़िश से जुड़ा गंभीर अपराध माना है।
चौथे आरोपी को क्यों मिली राहत?
यह तथ्य कि सुहैल अहमद भट को अदालत ने दोषी नहीं पाया, इस मामले की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष उसके खिलाफ पर्याप्त और विश्वसनीय सबूत पेश करने में विफल रहा। NIA यह साबित नहीं कर सकी कि सुहैल का ज़ाकिर मूसा से कोई प्रत्यक्ष संपर्क था। साथ ही हॉस्टल से बरामद हथियारों या कथित चरमपंथी सामग्री वाले लैपटॉप से भी उसका संबंध स्थापित नहीं किया जा सका।
यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था के उस सिद्धांत को भी मजबूत करता है कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दोष सिद्ध करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष पर होती है और उसे संदेह से परे जाकर आरोप साबित करने होते हैं।
एनआईए कोर्ट का बड़ा फैसला: राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्या संकेत?
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सुरक्षा एजेंसियां देश में आतंकी नेटवर्क के बदलते स्वरूप से निपट रही हैं। पहले जहां आतंकवादी गतिविधियां सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक केंद्रित थीं, वहीं अब डिजिटल नेटवर्क, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग और ऑनलाइन कट्टरपंथी प्रचार के जरिए युवाओं को प्रभावित करने की कोशिशें बढ़ी हैं।
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मोहाली NIA कोर्ट का यह निर्णय जांच एजेंसियों को यह संदेश देता है कि यदि वैज्ञानिक, फोरेंसिक और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर मजबूत केस तैयार किया जाए तो अदालत में उसे सफलतापूर्वक साबित किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका प्रत्येक आरोपी के खिलाफ उपलब्ध सबूतों का अलग-अलग मूल्यांकन करती है।
आगे क्या?
अक्टूबर 2018 से, तीनों कैदी हिरासत में हैं। सज़ा कितनी गंभीर होगी, यह तय करने के लिए कोर्ट ने 4 जून को सुनवाई तय की है। इन गंभीर आरोपों को देखते हुए, अब पूरा देश कोर्ट पर नज़र रखे हुए है कि वह दोषियों को क्या सज़ा देता है।
यह मामला भारत की आतंकवाद-रोधी नीति, डिजिटल फोरेंसिक जांच और न्यायिक प्रक्रिया के संगम काएकमहत्वपूर्ण उदाहरण बनचुका है। आने वालेदिनों मेंसजा पर होने वाला फैसला भी राष्ट्रीय सुरक्षासे जुड़ेमामलों की न्यायिक दिशा तय करनेमें अहम भूमिका निभा सकता है।
लेखक के बारे में:
अमित कौल
अमित कौल वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल न्यूज़ विश्लेषक हैं। वे राष्ट्रीय राजनीति, संस्कृति और समसामयिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। वर्तमान में वह Vartaprabhat.com के लिए नियमित लेखन कर रहे हैं।
