राम मंदिर डोनेशन विवाद: छिपे कैमरों से खुला कथित खेल, बैंक जमा में गड़बड़ी और रिश्तेदारों की भर्ती पर उठे सवाल
राम मंदिर डोनेशन विवाद: छिपे कैमरों से खुला कथित खेल, बैंक जमा में गड़बड़ी और रिश्तेदारों की भर्ती पर उठे सवाल
अयोध्या राम मंदिर डोनेशन विवाद में आठ लोगों की गिरफ्तारी के बाद कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। जानिए कैसे छिपे कैमरों, बैंक जमा में कथित गड़बड़ी और भर्ती प्रक्रिया ने पूरे मामले को बड़ा बना दिया।
राम मंदिर के दान पर उठे गंभीर सवाल
अमित कौल | डिजिटल डेस्क के लिए | बेंगलुरु | 26 जून, 2026 – अयोध्या का राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। हर दिन हजारों श्रद्धालु यहां दान करते हैं और मंदिर की दान पेटियों में बड़ी मात्रा में नकदी जमा होती है। ऐसे में यदि उसी दान राशि में कथित हेराफेरी के आरोप सामने आएं, तो यह केवल एक वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि सार्वजनिक विश्वास से जुड़ा गंभीर मामला बन जाता है।
हाल ही में सामने आए घटनाक्रम में आठ लोगों की गिरफ्तारी के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच ने कई ऐसे पहलुओं की ओर इशारा किया है, जिन्होंने पूरे मामले को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। हालांकि, इन सभी आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और विस्तृत जांच के बाद ही होगी।
राम मंदिर डोनेशन विवाद: शक कैसे पैदा हुआ?
पुलिस सूत्रों के अनुसार, मई के अंतिम सप्ताह में मंदिर प्रशासन ने दान पेटियों से निकली नकदी और बैंक में जमा कराई गई राशि का मिलान किया। इसी दौरान अधिकारियों को पहली बार असामान्य अंतर दिखाई दिया।
बताया गया कि सामान्य परिस्थितियों में प्रत्येक दान पेटी से लगभग 6 से 7 लाख रुपये प्राप्त होते थे। लेकिन इस बार 500 रुपये के नोटों के बंडलों में अपेक्षित राशि नहीं दिखाई दी। यहीं से अधिकारियों को संदेह हुआ कि कहीं न कहीं गिनती या जमा प्रक्रिया में गड़बड़ी हो रही है।
CCTV होने के बावजूद क्यों लगाए गए छिपे कैमरे?
जांच का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि संबंधित कक्ष में पहले से CCTV कैमरे मौजूद थे। इसके बावजूद मंदिर प्रशासन ने कथित तौर पर छिपे हुए कैमरे लगाने का फैसला किया।
पुलिस सूत्रों का दावा है कि कुछ कर्मचारियों की गतिविधियां CCTV कैमरों की सीधी निगरानी से बच जाती थीं। आरोप है कि कर्मचारी जानबूझकर कैमरों के सामने खड़े होकर दृश्य बाधित करते थे, जबकि दूसरा व्यक्ति नकदी के बंडलों से नोट निकालकर अपने कपड़ों में छिपा लेता था।
करीब एक सप्ताह तक चली गुप्त रिकॉर्डिंग में कथित रूप से ऐसी गतिविधियां दर्ज होने का दावा किया गया, जिसके बाद जांच ने तेजी पकड़ ली।
राम मंदिर डोनेशन विवाद: कथित हेराफेरी का दूसरा तरीका
जांचकर्ताओं के अनुसार केवल नकदी निकालना ही कथित तरीका नहीं था।
पुलिस का दावा है कि नकदी के बंडल तैयार करते समय उनमें जानबूझकर अतिरिक्त नोट रख दिए जाते थे। जब यही नकदी बैंक पहुंचती थी तो वहां पूरी रकम दोबारा गिनने के बजाय केवल बंडलों की संख्या के आधार पर जमा वाउचर तैयार किए जाते थे।
आरोप है कि मंदिर से बैंक के बीच परिवहन के दौरान उन्हीं अतिरिक्त नोटों को निकाल लिया जाता था। चूंकि बैंक रिकॉर्ड में बंडलों की संख्या वही रहती थी, इसलिए जमा की गई राशि कागजी तौर पर सही दिखाई देती थी, जबकि कथित रूप से नकदी का हिस्सा रास्ते में ही निकाल लिया जाता था।
यदि जांच में यह दावा सही साबित होता है, तो यह केवल चोरी नहीं बल्कि पूरी प्रक्रिया की कमजोरियों का फायदा उठाकर की गई सुनियोजित वित्तीय हेराफेरी मानी जाएगी।
राम मंदिर डोनेशन विवाद: किन-किन लोगों के नाम सामने आए?
पुलिस जांच के अनुसार, दान वाउचर तैयार करने का कार्य देखने वाले अनुकल्प मिश्रा पर कथित रूप से मुख्य भूमिका निभाने का आरोप है।
जांचकर्ताओं का दावा है कि उन्होंने अपने रिश्तेदार लव कुश मिश्रा के साथ मिलकर इस पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया। पुलिस के मुताबिक, जांच के दौरान लव कुश मिश्रा के घर से करीब ₹10 लाख कैश मिला।
हालांकि, आरोपियों की ओर से इन आरोपों पर अंतिम कानूनी स्थिति अदालत में तय होगी।
भर्ती प्रक्रिया भी जांच के घेरे में
मामला केवल कथित नकदी हेराफेरी तक सीमित नहीं रहा।
पुलिस सूत्रों का आरोप है कि दान गिनने वाली टीम में शामिल कई कर्मचारियों की नियुक्ति नियमित और पारदर्शी प्रक्रिया के बजाय निजी संपर्कों और सिफारिशों के माध्यम से हुई थी।
जांच में यह भी दावा किया गया है कि राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव, जो पहले श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के ड्राइवर रह चुके थे, सुपरवाइजर के रूप में कार्यरत थे। आरोप है कि उन्होंने अपने चचेरे भाई मनीष यादव को टीम में शामिल कराया।
इसी प्रकार अनुकल्प मिश्रा द्वारा अपने साले लव कुश मिश्रा की नियुक्ति कराने का भी आरोप लगाया गया है।
यदि ये आरोप सही सिद्ध होते हैं, तो मामला केवल आर्थिक अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।
राम मंदिर डोनेशन विवाद: आगे की जांच में क्या अहम होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब अभी मिलने बाकी हैं—
* कथित हेराफेरी कितने समय तक चली?
* कुल कितनी राशि प्रभावित हुई?
* क्या इसमें और लोग शामिल थे?
* बैंक में जमा प्रक्रिया की निगरानी व्यवस्था क्यों विफल रही?
* भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या नई व्यवस्था बनाई जाएगी?
जांच खत्म होने के बाद ही इन सवालों के जवाब साफ होंगे।
निष्कर्ष
राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है। ऐसे में दान राशि से जुड़े किसी भी विवाद का प्रभाव केवल वित्तीय नहीं बल्कि सामाजिक और भावनात्मक भी होता है।
फिलहाल पुलिस की जांच जारी है और कई दावे अभी आरोपों के स्तर पर हैं। अंतिम सत्य न्यायिक प्रक्रिया और आधिकारिक जांच रिपोर्ट के सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा। तब तक इस मामले को तथ्यों और आधिकारिक जानकारी के आधार पर ही देखना उचित होगा।
लेखक के बारे में:
अमित कौल
अमित कौल वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल न्यूज़ विश्लेषक हैं। वे राष्ट्रीय राजनीति, संस्कृति और समसामयिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। वर्तमान में वह Vartaprabhat.com के लिए नियमित लेखन कर रहे हैं।
